-मनोज कुमार शर्मा
बांग्लादेश में हिंदुओं पर हो रहे लगातार अत्याचार केवल एक देश का आंतरिक विषय नहीं, बल्कि मानवता पर लगा हुआ कलंक हैं। समाचार चैनलों और सोशल मीडिया के माध्यम से जो तस्वीरें और रिपोर्ट सामने आ रही हैं, वे हर संवेदनशील व्यक्ति की आत्मा को झकझोर देने वाली हैं। मंदिरों पर हमले, घरों को जलाना, महिलाओं-बच्चों में भय—यह सब किसी एक घटना का नहीं, बल्कि सुनियोजित रूप से हिंदुओं को टारगेट करने की मानसिकता का प्रमाण है।
दुनिया के सभी सभ्य और लोकतांत्रिक देशों को राजनीतिक चश्मा उतारकर, मानवीयता के नाते इन अत्याचारों पर संज्ञान लेना चाहिए। चुप्पी भी अपराध होती है—और आज वैश्विक मौन, अत्याचारियों को और अधिक साहसी बना रहा है।
साथ ही, भारत में बैठकर जो लोग हिंदुओं को जातियों में तोड़कर घटिया वोट बैंक की राजनीति करते हैं, उन्हें भी यह सच्चाई समझनी चाहिए कि जब हिंदू अल्पसंख्यक होता है, तब कोई ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र नहीं देखा जाता—सिर्फ “हिंदू” देखा जाता है। बांग्लादेश हो या दुनिया का कोई और कोना, अत्याचार करने वालों की नजर में जाति नहीं, केवल पहचान होती है—और वह पहचान है हिंदू।आज समय है आत्ममंथन का। हिंदू समाज को बाँटने वाली राजनीति बंद होनी चाहिए, क्योंकि विभाजन कमजोरी लाता है और एकता ही सुरक्षा। अगर आज भी हम नहीं जागे, तो इतिहास हमें माफ नहीं करेगा।
यह केवल बांग्लादेश के हिंदुओं की लड़ाई नहीं है—यह पूरे हिंदू समाज की चेतना और अस्तित्व का प्रश्न है।





