ब्रज की भगतलीला का भूटान में गूंजा दो दिन नक्कारा

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  • भूटान सरकार द्वारा अंतर्राष्ट्रीय इंडो- भूटान साहित्य कला महोत्सव – 2025 में सराही गई ब्रज की भगतलीला (नौटंकी) • एक तरफ दिखाई मोरध्वज की दानवीरता तो दूसरी ओर वैज्ञानिक दोषों की जानकारी देते हुए रात्रि भोजन न करने की दी शिक्षा।
  • 6 दिवसीय आयोजन में मथुरा की रामलीला और रासलीला का भी होगा मनोहारी मंचन।

मथुरा। भूटान सरकार के नेहरू-वांगचुक सांस्कृतिक केन्द्र (गृह मंत्रालय,सांस्कृतिक विभाग थिम्पू , भूटान) द्वारा आयोजित 6 दिवसीय इंटरनेशनल इंडो-भूटान फेस्टो के उद्घाटन अवसर पर ब्रज की सुप्रसिद्ध संस्था ब्रज संस्कृति केन्द्र,मथुरा के कलाकारों के द्वारा ब्रज की परम्परागत भगतलीला – दानवीर राजा मोरध्वज तथा दूसरे दिन- निशि भोजन निषेध का मंचन अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त वरिष्ठ साहित्यकार व लोकनाट्य विशेषज्ञ आचार्य डॉ. खेमचंद यदुवंशी शास्त्री के निर्देशन में किया गया।
इससे पूर्व भूटान सरकार के गृह व संस्कृति मंत्री लोयपो शेरूब ग्याल्त्शेन व भारतीय राजदूत संदीप सिंह ने दीप प्रज्वलन कर विधिवत उद्घाटन करते हुए कहा कि भारतीय संस्कृति कला व साहित्य बेहद समृद्ध हैं जिनमें से भगतलीला सबसे पुरानी अर्थात सतयुग कालीन लोकनाट्य है और आज हम उसे भूटान की धरती पर देख पा रहे हैं यह हमारे लिए सौभाग्य की बात है।
इस अवसर पर भारतीय लोकनाट्यों का परिचय देते हुए आचार्य डॉ. खेमचंद यदुवंशी शास्त्री ने कहा कि भगतलीला का उदय लीला नाटकों से भी पहले मथुरा के मंदिरों से सतयुग में हुआ और धीरे धीरे मथुरा,वृंदावन,हाथरस आदि क्षेत्रों से पनपती हुई पूरे भारत में व्याप्त हो गई और 20वीं शताब्दी के प्रारंभ में हाथरस के पंडित नत्थाराम गौड़ के द्वारा विश्व के अनेकानेक देशों तक पहुंचाई गई,जो वर्तमान में भी विश्व स्तर पर स्थापित है क्योंकि इसके अंतर्गत गायन अभिनय व नृत्य तीनों का समावेश होने के कारण सभी भाषाई इसे बेहद पसंद करते हैं। कुछ लोगों ने भगतलीला के एक स्वरूप नौटंकी शब्द को एक मुहावरा बना दिया गया है जो गलत है, उन्हें भगतलीला/नौटंकी के वास्तविक स्वरूप को समझना होगा मुहावरे के रूप में प्रयोग बंद करना होगा। “

तदोपरांत नक्कारे की खनक के साथ भगतलीला दानवीर राजा मोरध्वज का मंचन प्रारम्भ हुआ जिसमें दर्शाया गया कि कृष्णभक्त कृष्णभक्त दानवीर राजा मोरध्वज ने साधु रूप में अपने द्वार पर आए भगवान श्रीकृष्ण व अर्जुन के मांगे जाने पर अपने एकमात्र पुत्र युवराज ताम्रध्वज को आरे से चीर कर उनके साथ आए शेर के भोजनार्थ दान में दे दिया गया,उनकी भक्ति और दानवीरता देख कर अर्जुन नतमस्तक हो गया तब श्रीकृष्ण युवराज को जीवित कर मोरध्वज को परमभक्ति का वरदान भी देते हैं।

दूसरे दिन जैनधर्म के अनुसार रात्रि भोजन त्याग की भावना को बलवती बनाने के उद्देश्य से भगतलीला- निशिभोजन निषेध मंचित की गई जिसमें दर्शाया गया कि जैन कन्या मधुलिका का विवाह एक गैर जैन परिवार में हो जाता है जहां वह रात्रि के समय भोजन नहीं करती, जिस पर ससुराल पक्ष उसे जब समझाने का प्रयास करता है तब वह उन्हें रात्रि भोजन के वैज्ञानिक दोष व दिन में भोजन करने के अनेकानेक लाभ बताती है परिणाम स्वरूप पूरा परिवार रात्रि भोजन त्याग कर दिन के समय ही भोजन करने लगता है। बहू की यह सीख अन्य पड़ोसी भी अपनाकर बीमारियों से मुक्त हो जाते हैं जिस पर मौहल्ले का डॉक्टर नाराज हो जाता है क्योंकि उसकी डॉक्टरी की दुकान बन्द होने के कगार पर आ गई, ईश्यावश डॉक्टर उसके पति को रात्रि के समय एक रेस्टोरेंट में ले जा कर विषाक्त भोजन खिलाता देता है जिससे पति की घर लौटने पर तबियत खराब होकर तत्काल मृत्यु हो जाती है। पूरे घर में कोहराम मच जाता है,प्रातः होने बहू जैन मंदिर में जाती है तथा मूलनायक जिन भगवान से अपने सुहाग की रक्षा हेतु प्रार्थना करती है, जैन सुधर्म इन्द्र उन्हें गन्दोदक देते हैं जिसे लाकर वह अपने पति की मृत देह के मुँह में डाल कर पार्श्वनाथ स्त्रोत मंत्र का जाप करती है। परिणाम स्वरूप उसका पति जिंदा हो जाता है अंत में सभी अन्य को शिक्षाप्रद संदेश प्रसारित करते हुए रात्रि भोजन त्यागने की शपथ लेते हैं।
मथुरा की सांस्कृतिक छाया को देखने के लिए राजधानी थिंपू पंचतारा होटल व्हाइट तारा का पूरा सभागार भूटानी व प्रवासी भारतीयों से खचाखच भरा हुआ था।
अंत में भारतीय राजदूत संदीप सिंह ने मथुरा के सभी कलाकारों की ऊंची टीपदार स्वर लहरी व मधुर संगीत की भूरि भूरि प्रशंसा करते हुए सभी का आभार व्यक्त किया।

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