संस्कृति विवि में अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठीः वेद सिर्फ धर्म नहीं खुद को समझने का तरीका

मथुरा। संस्कृति यूनिवर्सिटी के संतोष मैमोरियल आडिटोरियम में आयोजित दो दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी में दूसरे दिन की शुरुआत जाने-माने विद्वानों के प्रेरणादायक सत्रों से हुई। विद्वान वक्ताओं ने वैदिक ज्ञान, फिलॉसफी, चेतना और आज की ज़िंदगी में वैदिक साहित्य के उपयोग पर ज्ञानवर्धक वक्तव्य दिए।
वैदिक ज्ञाता एवं कवि आदित्य रंगन ने पारंपरिक मंत्रों का जाप करके और हर सीखने की प्रक्रिया को एक पवित्र सोच के साथ शुरू करने के महत्व को बताकर सत्र की शुरुआत की। भारत दर्शन के संपादक प्रो. टी.एन. प्रभाकर ने कन्नड़ प्राणायाम और इसकी पुरानी जड़ों पर प्रकाश डाला । राष्ट्रीय चिकित्सक आयोग के पूर्व अध्यक्ष प्रो. डॉ. साई रघुराम भट्ट को ने वैदिक साहित्य के महत्व पर ज़ोर दिया और पब्लिकेशन और नई सीख के ज़रिए “जीवित वेद” पर ज़ोर दिया। महर्षि संदीपनी राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान उज्जेन के वाइस चेयरमैन प्रो. प्रफुल्ल कुमार मिश्रा ने भारतीय ज्ञान परंपराओं पर सोचने पर मजबूर करने वाले विचार साझा किए। उन्होंने वर्ल्ड फेयर के लिए श्री अरविंद के काम का ज़िक्र किया, वेदों की पढ़ाई के लिए सही समय पर चर्चा की, और सीखने के सफ़र में माता-पिता और गुरुओं के आशीर्वाद के महत्व पर ज़ोर दिया। उन्होंने कहा, वेद सिर्फ़ धर्मग्रंथ नहीं हैं बल्कि खुद को समझने का एक तरीका हैं।
नासा, अमेरिका के पूर्व वैज्ञानिक डॉ. आर. नारायण स्वामी ने ऋग्वेद के भजन , ‘तत् एकम्’ पर एक विद्वत संबोधन किया और इसकी दार्शनिक गहराई और “एक जिसके कई नाम हैं” के विचार को समझाया । उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि वैदिक पढ़ाई का मकसद सिर्फ़ पुराने टेक्स्ट बताना नहीं है, बल्कि नई पीढ़ी को अपनी स्पिरिचुअल विरासत से परिचित कराना है।
अगले सत्र में ऋग्वेद के 10552 मंत्रों, उसके 10 मंडलों और 1050 सूक्तों के बारे में बताया गया। इस सत्र का मुख्य संदेश था कि वेद सर्वोच्च आत्मा की बात करते हैं और सच्चाई और नेकी के मूल्य सिखाते हैं। उन्होंने स्टूडेंट्स को प्रेरित करते हुए कहा, जब रोशनी आती है, अंधेरा मिटता है। बाल रोग विशेषज्ञ विद्वान वक्ता डॉ. योगेश वाइकर ने पुरुष, विशेष पुरुष और खुद की बनावट, मन, प्रमाण और आत्मा के कॉन्सेप्ट पर बात की। उन्होंने सेल्फ-अवेयरनेस और अपनी पहचान, पैशन और उद्देश्य को समझने पर ज़ोर दिया। उन्होंने नासदीय सूक्त और हिरण्यगर्भ सूक्त के बारे में भी विस्तार से बताया। उन्होंने कहा वेद किताबों में नहीं आप के अंदर हैं। वैदिक स्कालर और कवि आदित्य रंगन ने अपने संस्कृत में दिए वक्तव्य में कहा कि “ज़िंदगी को सफल क्या बनाता है?” उन्होंने शांति, खुशी और खुशहाली के महत्व पर ज़ोर दिया, और इस पर चर्चा की कि वैदिक मंत्र शारीरिक, मानसिक और आर्थिक सेहत में कैसे मदद करते हैं। स्वामी विवेकानंद योग अनुसंधान एवं संस्थान के कुलपति राम चंद्र भट्ट ने “ॐ” के साइंटिफिक अभ्यास पर एक सेशन किया और जाप के ज़रिए वेदों को समझने के पाँच खास बिंदु अंरवाणी, अंतरयात्रा, अंतरयज्ञ, अंतर्दृष्टि और अंतरात्म के बारे में बताया। अगले सत्र में ओरियंटल स्टडी के विद्वान डॉ. आर.वी. जहागीरदार ने स्टूडेंट्स से बातचीत की और पूछा कि कितने वैदिक ज्ञान से परिचित हैं या वैदिक पढ़ाई में दिलचस्पी रखते हैं। उन्होंने चारों वेदों की बेसिक बातें, लगभग 20,00,000 कुल वैदिक लाइनें और अलग-अलग तरह के मंत्रों के बारे में बताया। उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि वेद जीवन का जश्न मनाते हैं और हमें खुशी से जीना सिखाते हैं।

मॉडर्न लीडरशिप में वैदिक सिद्धांतों का प्रयोग
मथुरा। संस्कृति यूनिवर्सिटी के संतोष मैमोरियल आडिटोरियम में आयोजित दो दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी में विभिन्न ज्ञानवर्धक सेशनों में वेदों के उपयोग पर विद्वानों ने अपने विचारों के साथ विद्यार्थियों और श्रोताओं को बताया कि किस तरह से हमारे वेद वैज्ञानिक पैमाने पर खरे उतरते हैं। उन्होंने बताया कि ज्यादातर विदेशी लेखकों ने वेदों को सही अर्थों में समझे बिना अपनी टिप्पणियां कीं तब श्री अरविंद ने वेदों की सही और अर्थपूर्ण व्याख्या कर लोगों को बताया कि दरअसल वेद वर्तमान और भविष्य की चुनौतियों से निबटने का कैसे रास्ता बताते हैं।
“मॉडर्न लीडरशिप में वैदिक सिद्धांतों का इस्तेमाल” पर आयोजित सेशन में संस्कृति विवि के कैप्स के निदेशक डॉ. रजनीश कुमार त्यागी ने ने पुराने वैदिक ज्ञान को आज की लीडरशिप को जोड़ते हुए इस बात पर ज़ोर दिया कि वेद आज भी बहुत ज़रूरी हैं। उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि भले ही महर्षि अरविंद अब नहीं हैं, लेकिन उनकी फिलॉसफी की शिक्षाएं अरविंद सोसाइटी के ज़रिए आने वाली पीढ़ियों को गाइड करती रहेंगी। उन्होंने वेदों में पूजनीय माँ जगदंबा के दिव्य महत्व पर भी ज़ोर दिया। प्रो. रेणुका राठौर ने महिला ऋषियों की कम पहचान के बारे में एक ज़रूरी सवाल पर बात की। उन्होंने साफ़ किया कि पुराने ज़माने में, औरतें वैदिक मंत्रोच्चार और मंत्र बनाने में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेती थीं। उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि वेदों में औरतों को ऊँचा दर्जा दिया गया है और सतयुग की वापसी उसी पल शुरू होती है जब समाज हर औरत को देवी मानना शुरू कर देता है। डा. पंकज गोस्वामी ने वैदिक विरासत और वैश्विक एकता के संबंध को विस्तार से समझाया।
चर्चा के दौरान डॉ. आर. नारायण स्वामी ने कहा कि वेद दुनिया की सबसे पहली और सबसे पूरी ज्ञान की किताबें हैं। उन्होंने वैदिक मंत्रों की बदलने वाली ताकत पर ज़ोर दिया, और बताया कि वैदिक मंत्रों का जाप करने और उन्हें सुनने से माहौल साफ़ होता है और दिमागी शांति बढ़ती है। किशोर कुमार त्रिपाठी ने भगवान राम और भगवान कृष्ण के बीच कनेक्शन पर सवालों के जवाब दिए, वाल्मीकि रामायण का ज़िक्र किया। उन्होंने चार वेदों के होने की बात को फिर से सुनिश्चित किया। रवि देव आर्य ने वेदों में धर्म के विचार पर अपना ओजपूर्ण वक्तव्य दिया। प्रो. प्रभाकर टीएन भारत पंचमो वेदः पर अपनी विस्तृत व्याख्या की। प्रो.प्रफुल्ल कुमार मिश्रा ने यजुर्वेद पर श्री अरविंद के प्रकाश में किए गए अध्ययन पर प्रकाश डाला। डा. सुधिष्ठा मिश्रा ने पुरुष सूक्त पर गूढ़ व्याख्या की। डा. अरुन प्रकाश ने श्री अरविंद के भारत एकात्मा के नजरिए को स्पष्ट किया। प्रो.रामचंद्र भट्ट ने श्री अरविंद के वेदों के नजरिए की व्याख्या की। इस दौरान श्रोताओं द्वारा सवाल किए गए जिनपर विद्वानों ने बड़े संतुष्टिपूर्ण जवाब दिए। श्रोताओं की राय में इस सेशन से उन्हें कम समय में बहुत ज़्यादा ज्ञान मिला, जिससे वैदिक साइंस और मॉडर्न लाइफ में इसकी अहमियत के बारे में उनकी समझ गहरी हुई।
दूसरे दिन लिविंग वेदा विषय पर जानकारी वाली दो महत्वूर्ण पुस्तकों का विमोचन किया गया। संगोष्ठी के दौरान आए विद्वानों को संस्कृति विवि के कुलाधिपति डा. सचिन गुप्ता और कुलपति प्रो. एमबी चेट्टी ने शाल ओढ़ाकर और स्मृति चिह्न देकर सम्मानित किया गया।

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