हमारे पूर्वजों की ऐसी परंपरा रही हैं जो आज नई पीढ़ी को देखने को मिलती हैं और पूर्वजों की इन परंपराओं को देखकर नई पीढ़ी बहुत खुश होती है और क्षेत्र वासियों का यही कहना है कि यह परंपरा हमारी जीवंत रहे
महेश चंद्र की रिपोर्ट
मथुरा। गांव मगोर्रा के मोहल्ला राम पट्टी में होलिका दहन के स्थान पर बहुत पुरानी परंपरा के अनुसार हर वर्ष की तरह मेले का आयोजन होता चला आ रहा है। गांव वालों का कहना है कि यह मेला हर वर्ष होलिका दहन के तीन दिन बाद लगता हैं गांव वाले इस मेले को फूलडोल के नाम से बताते हैं और इस मेले की खास बात यही है कि इस मेले में अलग-अलग गांव से चौपाइयां आती है जो कि इनको गांव वाले बम के नाम से बोलते हैं और इन चौपाइयों के द्वारा एक प्रतियोगिता जैसी होती है और यह चौपाइयां लगभग दो या तीन बजे आ जाती है और शाम तक इनको होली के भजन गीत गाने गा गा कर बजाते हैं और फिर इनको गांव में परिक्रमा लगाने के लिए ले जाते हैं और जो चौपाइयां जीत जाती है उनको गांव के सभी लोग इकट्ठे होकर इनाम देते हैं और इस मेले में काफी पुरानी परंपरा के अनुसार जितने भी क्षेत्र के आसपास के गांव हैं उन गांव में चलकर जिस किसी के पास किसी भी प्रकार की कोई कला होती है तो उस कला का प्रदर्शन निशुल्क दिखाते हैं जैसे सपेरे अपनी बीन बजाने की कला, डोल लगाड़े, बैंड बाजे, नाचने वाले नाचने की कला जादूगर अपनी जादूगरी और मेले में सुबह से ही सारी दुकान सजने लगती है विभिन्न प्रकार के झूले जलेबियां की दुकान भल्ले टिकिया की दुकान विभिन्न प्रकार की दुकानें सजती हैं और शाम होते ही मेल में काफी भीड़ इकट्ठी हो जाती है और मेले को देखने के लिए आसपास के जितने भी गांव लगते हैं उन सभी गांव में से लोग छोटे बड़े बुजुर्ग महिला सभी मेला देखने के लिए बड़े ही चाव से आते हैं और मेले का आनंद लेते हैं और मेला हर वर्ष बड़ी धूमधाम से लगता है गांव वाले बताते कि इस मेले को लगने के बाद ऐसा लगता है हमारे ब्रज मण्डल में पुराने समय से ही कुछ हमारे पूर्वजों की ऐसी परंपरा रही है।





