
राणा सांगा एक वीर योद्धा थे
राणा सांगा भारतीय इतिहास के एक महान योद्धा और मेवाड़ के पराक्रमी राजा थे। उन्होंने अपने जीवनकाल में कई युद्ध लड़े और विदेशी आक्रमणकारियों को कड़ी चुनौती दी। उनकी वीरता और बलिदान सनातन धर्म की रक्षा के प्रतीक हैं।
राणा सांगा का असली नाम महाराणा संग्राम सिंह था। वह 16वीं शताब्दी में मेवाड़ राज्य के शासक रहे। अपने शासनकाल में उन्होंने लोदी वंश, गुजरात के सुल्तान, मालवा के शासकों और मुगल आक्रमणकारी बाबर के खिलाफ संघर्ष किया।
राणा सांगा ने अपनी वीरता से न केवल राजपूतों बल्कि समूचे भारतवर्ष के स्वाभिमान को ऊंचा किया। उनके शरीर पर 80 से अधिक घाव थे, फिर भी वह रणभूमि में अंतिम सांस तक लड़े।
कुछ इतिहासकारों का मत है कि खानवा के युद्ध (1527) में राणा सांगा को उनके कुछ विश्वासपात्र सरदारों ने धोखा दिया, जिसके कारण उन्हें पराजय का सामना करना पड़ा। लेकिन इसे गद्दारी कहना उचित नहीं होगा, बल्कि यह एक कूटनीतिक षड्यंत्र था, जिसका लाभ मुगलों ने उठाया।
सनातन धर्म और संस्कृति के संरक्षक
राणा सांगा केवल एक योद्धा ही नहीं, बल्कि सनातन धर्म और भारतीय संस्कृति के सच्चे रक्षक थे। उन्होंने सदैव हिंदू एकता के लिए कार्य किया और विदेशी ताकतों के विरुद्ध संघर्ष किया।
राणा सांगा की वीरगाथा अमर है
राणा सांगा का बलिदान और उनकी शौर्य गाथा आज भी प्रत्येक सनातनी और राष्ट्रभक्त के लिए प्रेरणास्रोत है। उनका जीवन हमें सिखाता है कि कठिनाइयों के बावजूद धर्म, राष्ट्र और स्वाभिमान की रक्षा के लिए सदैव तत्पर रहना चाहिए।
“राणा सांगा अमर रहें! जय मेवाड़! जय सनातन!”
-मनोज कुमार शर्मा