खम ठोंक ठेलता है जब नर, पर्वत के जाते पांव उखड

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भगवान परशुराम का जन्मदिन, अक्षय तृतीया, वीरता का दिन, नए संकल्पों को साकार करते हुए उन्हें मूर्त रूप देने का दिन, ब्राह्मण शक्ति प्रदर्शन का दिन, भाषणबाजी का दिन, बुलंद हौसलों के प्रदर्शन का दिन और अगर ओछे शब्दों में कहा जाए तो दोगलेपन के प्रदर्शन का दिन। आप को जो ठीक लगे नाम दें मगर कम समय में अपना महत्वपूर्ण समय लगाते हुए दिन-रात एक करके ऑवला के युवाओं ने आखिर वो कर ही दिखाया जिसकी पुरोधा केवल कल्पना ही कर सकते थे।तपती दुपहरी में ऑवला की सडकों पर भगवा रंग के हुजूम के साथ लहराते फरसे और जोश में परशुराम के वंशज हैं हम के गगनचुंबी नारों के साथ जो रवानगी सिद्ध स्थली पुरैना से हुई तो शहर की सड़कें संकरी नजर आने लगीं।पुलिस प्रशासन की चाक- चौबंद व्यवस्था के बावजूद इतने संयम से रही इस रवानगी में लगा ही नहीं कि पुलिस की कोई जरूरत भी है। जगह जगह फूल बरसाए गए, इतनी गर्मी में शीतल जल वितरण किया गया खास बात यह रही इस अराजनैतिक संगठन में लगभग सभी ने पूरे मनोयोग से हिस्सा भी लिया। यूं तो समय समय पर बिप्र समाज द्वारा शहर में परशुराम चौक हेतु पालिका प्रशासन से मांग की जाती रही और कुछ बडों की नाक ऊंची रहे इसकी भेंट चढती रही। मगर इस बार हालात कुछ अलग ही रहें। कमान बुजुर्गों के पास नहीं युवाओं के हाथ रही। करीबी गांव में तकरीबन हजार दावत नामे बांटे गए, सोशल मीडिया के माध्यम सें आमंत्रण भी दिया और आयोजन की भव्य व्यवस्था की गई।लेकिन संशय था कि कामयाबी मिलेगी भी। ग्यारह बजे तक सिद्ध स्थली पुरैना परिसर में ब्राह्मण कम और प्रशासन के लोग ज्यादा नजर आए आशंका रही कि हुजूम कहीं कम न रहे बहुत सोचकर रवानगी का वक्त साढे बारह बजे रखा गया और यह चमत्कार ही कहा जाएगा कि सरज़मीन ऑवला की सडक भी संकरी नजर आने लगी तपती दोपहर भी परशुराम वंशजों को जमा होने से न रोक सकी। और वहीं हुआ जो तय था शहर के बेहटाजवी चौराहे पर प्रतीक स्वरूप फरसा गाड़ कर परशुराम चौक की प्रतिस्थापना की रस्म संपन्न की गई। जन समूह को संबोधित करते हुए वक्ताओं द्वारा बताया गया कि दस लाख लागत शासन द्वारा नगरपालिका माध्यम से उक्त चौक निर्माण पर व्यय की जाएगी। कुछ ने दोगलेपन का प्रदर्शन कर राज्य सरकार को नजरअंदाज करते हुए निकाय अध्यक्ष को सेहरा बाधने की कोशिश भी की जिसे समाज ने नकारते हुए इसे प्रदेश के धर्मप्रिय मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ की देन बताया व निकाय अध्यक्ष को इस कार्य में वाहक बन सहयोग देने के लिए धन्यवाद ज्ञापित किया। जिनको खुशी हुई उन्होंने प्रसाद भी लिया और दोगलेपन का प्रदर्शन करने वालों ने वहां से खिसकना ही ठीक समझा।बहरहाल मंचासीन सभी बड़ों ने इस कार्यक्रम की दिल से सराहना की सो अलग। यह और बात है कि कुछ लोग इस कार्यक्रम में अपनी राजनैतिक रोटियां न सेंक पाए, अलबत्ता उन्होंने कोशिश बहुत की।शायद ऐसी ही कोशिश गांव के कुछ मासूमों को बीती रात भड़का कर चौक उद्घाटन में अवरोध उत्पन्न करना रहा जिसे प्रशासन द्वारा बडी सूझ बूझ का प्रदर्शन कर फौरन शान्त किया जाना एक सराहनीय काम रहा। यह तो यकीन के साथ कहा जा सकता है कि जब भी कोई वीरता पूर्ण कार्य पृथ्वीराज करता है तो अक्सर जयचंद पैदा हो ही जाते हैं। बहरहाल ब्राहमण समाज को नजरअंदाज कर सत्ता से बाहर हुए लोगों को भी वक्त रहते यह समझ आ ही गया कि बिना ब्राहमणों के सहयोग जीत संभव नहीं है तो उन्होंने अगुवानी करना ही बेहतर समझ।कहा जा सकता है शहर में परशुराम चौक की स्थापना को मूर्त रूप देना एक रस्म नहीं एक संकल्प- एक चुनौती है जिसे अपनी ओजस्वी ललकार के साथ युवाओं ने साफ कर दिया है कि वो एक ऑधी हैं जिन्हें रोकना अब संभव नहीं। वैसे राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की सुप्रसिद्ध कविता ‘वीर’ की पंक्तियाँ हैं ही कुछ ऐसी कि मुर्दों में जान फूंक दें इंसान चीज ही क्या है आप खुद पढकर महसूस कर सकते हैं-
खम ठोंक ठेलता है जब नर, पर्वत के जाते पांव उखड।
मानव जब जोर लगाता है पत्थर पानी बन जाता है। 
यह ओजस्वी कविता मनुष्य के अदम्य साहस, पुरुषार्थ और संघर्ष क्षमता को दर्शाती है, जो बताती है कि दृढ़ निश्चय के सामने पर्वत जैसी बाधाएँ भी टिक नहीं सकतीं। यह तो फिर भी परशुराम चौक निर्माण स्थल पर फरसा गाड़ने की चुनौती थी। जिसे स्वीकार ब्राहमण शिरोमणि ने साबित कर दिया कि हम श्रेष्ठ ऐसे ही नहीं कहे जाते।

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