

लोहवन, मथुरा। देशभर में रक्षाबंधन का पर्व सावन पूर्णिमा को मनाया जाता है, लेकिन ब्रज क्षेत्र के गांव लोहवन में इसकी एक अनूठी और सदियों पुरानी परंपरा आज भी जीवित है। यहां रक्षाबंधन सावन पूर्णिमा के 13 दिन बाद, भाद्रपद शुक्ल पक्ष की तृतीया को बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है।
यह परंपरा विशेष रूप से लोहवनवंशी ब्राह्मणों के रावत गोत्र में निभाई जा रही है। न केवल लोहवन गांव में, बल्कि यहां से निकलकर देश के सुदूर क्षेत्रों में बसे रावत परिवार भी प्रतिवर्ष इसी दिन रक्षाबंधन का त्योहार मनाते हैं, जो अपने आप में एक मिसाल है।
मान्यता के अनुसार, सदियों पूर्व जब युद्ध का दौर था, तब रावत गोत्र के कुछ युवा पुरुष दुश्मनों से लड़ने के लिए युद्धभूमि में अन्यत्र स्थान पर गए हुए थे। सावन पूर्णिमा के दिन जब रक्षाबंधन का त्योहार था, तब गांव में भाई मौजूद नहीं थे, इसलिए बहनें राखी नहीं बांध सकीं। युद्ध समाप्त होने के बाद सभी युवा भाद्रपद शुक्ल पक्ष की तृतीया को सकुशल लोहवन वापस लौटे। भाइयों के लौटने की खुशी में उसी दिन बहनों ने उनके माथे पर तिलक लगाकर हाथों में राखी बांधी और इस दिन को उत्सव के रूप में मनाया।
तभी से यह तिथि रावत गोत्र के लिए रक्षाबंधन की नियत तिथि बन गई। इस दिन बहनें अपने भाइयों को राखी बांधती हैं, भाई बहनों की रक्षा का संकल्प लेते हैं और घरों में विशेष पकवान बनते हैं। बुजुर्गों का कहना है कि यह परंपरा भाई-बहन के अटूट प्रेम के साथ-साथ अपने वतन और परिवार के प्रति समर्पण का भी प्रतीक है।
भाद्रपद की तृतीया को मनाया जाने वाला यह रक्षाबंधन ब्रज की लोक-संस्कृति की विविधता और ऐतिहासिक विरासत को दर्शाता है।
