शिव और माता पार्वती का विवाह सनातन धर्म की एक दिव्य और प्रेरणा दायक कथा

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रायबरेली ब्यूरो धीरेंद्र शुक्ला की रिपोर्ट

ऊंचाहार (रायबरेली): कोल्हौर मजरे पट्टी रहस कैथवल गांव में आयोजित शिवमहापुराण कथा के तीसरे दिन सोमवार को कथा व्यास आचार्य सत्यांशु महराज ने भगवान शिव और माता पार्वती के विवाह प्रसंग का मार्मिक वर्णन किया। ‌उन्होंने कहा कि भक्ति, तपस्या और प्रेम ईश्वर की भी प्राप्ति हो जाती है। दृढ़ इच्छा शक्ति से माता पार्वती ने कठोर तपस्या कर भगवान शिव को प्रसन्न करते हुए महादेव को विवाह के लिए प्रेरित कर लिया। देवी देवताओं के उपस्थिति में यह दिव्या विवाह संपन्न हुआ जिसमें शिवजी एक तपस्वी के रूप में और पार्वती जी एक राजकुमारी के रूप में सजी थी। इस प्रसंग से समर्पण और अटूट प्रेम का संदेश मिलता है।
उन्होंने कहा कि भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह सनातन धर्म की एक दिव्य और प्रेरणादायक कथा है। जब देवी सती ने अपने पिता दक्ष के अपमान से विद्युत होकर आत्मदाह कर लिया तब भगवान शिव शोकाकुल होकर तपस्या में लीन हो गए। इस दौरान सती ने हिमालय राज के घर पार्वती के रूप में पुनर्जन्म लिया। पार्वती बचपन से ही शिव को अपना पति मान चुकी थी। माता पार्वती के कठोर तपस्या से प्रसन्न हुए, और विवाह के लिए राजी हुए। नारद मुनि और सप्त ऋषि के प्रयास से विवाह हेतु योग बना। भूत, प्रेत, नाग, गंधर्व और सिद्धू का विचित्र दल भगवान का बाराती बना। ‌ पार्वती की माता मैं यह देखकर घबरा गई, लेकिन पार्वती ने कहा कि यही मेरे आराध्य हैं। वैदिक मंत्रोचार और विधि विधान से भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह हुआ। उन्होंने कहा कि यह विवाह केवल दो दिव्य आत्माओं का मिलन ही नहीं बल्कि प्रकृति और पुरुष के संतुलन का प्रतीक भी माना गया है। शिव पार्वती का विवाह हमेशा अच्छी भक्ति, धैर्य और आपस में प्रेम की शिक्षा देता है। इस मौके पर आयोजन गंगा प्रसाद चौरसिया, हरि शरण सिंह, अनूप कुमार, आजाद चौरसिया, सचिन चौरसिया राघव सिंह, रामकिशोर, संजय सोनी अभिषेक कुमार, रॉबिन, समेत बड़ी संख्या में श्रोतागण मौजूद रहे।

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