छगनु बिछावन में बुख़ार से तड़प रहा है और बगल में उसकी माई भाग्यवन्ती पट्टी दे रही है कि बुख़ार उतर जाए।
इधर छगनु का बापू हरिया पुआल और बाँस से घर के छत को ठीक करने का असम्भव प्रयास करते हुए भनभनाता है……..”अंधड़ की तेज़ हवाओं से छत लगभग टूटने को है।हर बरस एक ही काम करता हूँ। लेकिन कोई फायदा न होता। घर की छत इतनी भली है कि बारिश की टिप-टिप से रातभर घर के सदस्यों को नहला देती है। मैं भी क्या करूँ। मजूरी करके खाने को दो बेला जुट जाए तो बहुत है।”
“मैं कूड़ा साफ करके घर के खर्चे में मदद तो करती हूँ पर इतना नहीं बचा पाती कि यौवन से भरपूर बेटी का ब्याह करा पाऊँ l” घर के एक कोने को पकड़ बारिश और अंधड़ के क़हर
से बचने की कोशिश करती बिटिया को देख भाग्यवंती भी बड़बड़ाई l
हरिया भीगे देह घर के अंदर आकर बेटा के सिरहाने बैठ कहता है…. ” बुख़ार भी अंधड़ के वेग जैसा क़हर बरसा रहा है।”
” पिताजी ,छत की मरम्मत कराओ और ईंट का घर बनवा दो।मेरे सब दोस्तों के घर ठीक हो रहे हैं।” छगनु रुआंसे स्वर में बोला ।
वह बेटे को फुसलाते हुए कहता है, “अबकी बार दीदी का ब्याह करा के जाड़े में घर और छत ठीक करवा दूँगा।”
“सच्ची बापू !” छगनु खुश होकर बुख़ार
की तपन भूल स्वप्नों में भ्रमण करने लगा।
सब देख सुनके भाग्यवन्ती की आँखें पति की ओर प्रश्नों की झड़ी लगाते हुए मुखरित हो उठीं…..”एक-एक करके हर आँधी कट जाती है और बच्चों को झूठे सपनों में गोते लगाने छोड़ देते हो। चन्दना का ब्याह और फिर बढ़िया घर कैसे संभव है ? “
हरिया की निःशब्द ,निरीह आँखें लाचारी उजागर करती हुई घरवाली की ओर देख ध्वनित हो उठीं…. “अबकी बरस बेटा को बहला दिया। बिटिया भी अपने भावी साथी संग संसार बसाने के सपनों में खो गई और निंदिया रानी संग लिपट गई।”
” छगनु सो गया। बुख़ार भी धीरे-धीरे कम गया है। जैसे बाहर अंधड़ का वेग कम रहा है।” बेटे का कपाल छूते हुए हरिया ने स्वयं को दिलासा
दिया l
उसकी आँखों में नींद न थी और उसकी घरवाली भी बेचैन कि इसी बीच विद्युत गर्जन में हरिया के मनमस्तिष्क के अंतर्द्वंद में दूसरी
आँधी चल पड़ी, ” सुबह फिर बाँस,पुआल,बेंत और खपरैल की मदद से छत ठीक करनी है क्योंकि कल फिर अंधड़ आया तो….।” अंततः वह भी अंतर्द्वंद की अंधड़ में आँखें झपकाने लगा।
शावर भकत ‘भवानी’
वृन्दावन
