बरसाना/ब्रज। ब्रजभूमि की पावन धरा पर श्रीराधारानी का प्राकट्योत्सव भक्ति, प्रेम और आध्यात्मिक उल्लास के साथ मनाया जाता है। रसिक संतों की वाणी में श्रीराधारानी को भगवान श्रीकृष्ण के हृदय में विराजमान उनकी परम प्रेममयी शक्ति एवं आह्लादिनी शक्ति के रूप में वर्णित किया गया है।
श्रीमद्भागवत के रसिक प्रवक्ता श्री कनुआ जी महाराज ने अपने शिष्यों एवं भक्तों को श्रीराधारानी के दिव्य प्राकट्य का यह गूढ़ रहस्य बताते हुए कहा कि गोलोक धाम में श्रीकृष्ण के हृदय से ही श्रीराधारानी का दिव्य प्राकट्य हुआ। राधा और कृष्ण का संबंध केवल दो स्वरूपों का संबंध नहीं, बल्कि एक ही परम प्रेम-तत्व की दिव्य अभिव्यक्ति है।
कथा-परंपरा के अनुसार, एक बार देवर्षि नारद जी ने भगवान नारायण से श्रीराधारानी के प्राकट्य का गूढ़ रहस्य जानने की इच्छा प्रकट की। तब भगवान नारायण ने उन्हें इस परम गोपनीय रहस्य का वर्णन किया। इस प्रसंग में श्रीराधारानी के दिव्य स्वरूप और श्रीकृष्ण के साथ उनके सनातन प्रेम-संबंध का आध्यात्मिक महत्व बताया गया है।
ब्रह्मवैवर्त पुराण की राधा-कृष्ण संबंधी कथा-परंपरा में श्रीराधारानी के दिव्य स्वरूप और उनके प्राकट्य से जुड़े प्रसंगों का विस्तार मिलता है। इसी भाव को आगे बढ़ाते हुए श्री कनुआ जी महाराज ने कहा कि श्रीराधारानी भगवान श्रीकृष्ण के हृदय की प्रेममयी शक्ति हैं। श्रीराधा के बिना श्रीकृष्ण की माधुर्य लीला और श्रीकृष्ण के बिना श्रीराधा के प्रेम-स्वरूप को पूर्ण रूप से समझना संभव नहीं है।
उन्होंने कहा कि ब्रज में श्रीराधारानी का प्राकट्योत्सव केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि दिव्य प्रेम और भक्ति का महापर्व है। राधाष्टमी के अवसर पर बरसाना सहित संपूर्ण ब्रज में श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ता है। मंदिरों में विशेष श्रृंगार, अभिषेक, मंगलगान, भजन-कीर्तन और दर्शन का आयोजन होता है। चारों ओर “राधे-राधे” के जयघोष से ब्रज की गलियां भक्तिमय हो उठती हैं।
श्री कनुआ जी महाराज ने भक्तों से आह्वान किया कि श्रीराधारानी के प्राकट्योत्सव पर केवल उत्सव मनाने तक सीमित न रहें, बल्कि उनके प्रेम, करुणा, सेवा, समर्पण और भक्ति को अपने जीवन में उतारने का संकल्प लें। उन्होंने कहा कि श्रीराधारानी का नाम स्वयं प्रेम-भक्ति का अमृत है और राधा नाम का स्मरण साधक के हृदय को भगवान की ओर ले जाने वाला सरल मार्ग है।
ब्रज की पावन भूमि पर जब राधाष्टमी का उत्सव आता है तो ऐसा प्रतीत होता है मानो स्वयं प्रेम ने ब्रज में पुनः जन्म लिया हो। श्रीजी के प्राकट्य की स्मृति में होने वाले उत्सव में देश-विदेश से श्रद्धालु बरसाना पहुंचकर श्रीराधारानी के चरणों में अपनी श्रद्धा अर्पित करते हैं।
“राधे नाम ही ब्रज की पहचान है, राधा ही ब्रज की प्राण हैं और श्रीराधारानी की कृपा ही श्रीकृष्ण-भक्ति का परम सौभाग्य है।
श्रीकृष्ण के हृदय से प्रकट हुईं श्री राधारानी, ब्रज में धूमधाम से मनाया जाता है प्राकट्योत्सव
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