संस्कृति विवि में समावेशी शिक्षा और शिक्षक की बदलती भूमिका पर गंभीर चर्चा

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मथुरा। संस्कृति विश्वविद्यालय के ब्लॉक-जी स्थित सेमिनार हॉल में प्रोफेसरों और संकाय सदस्यों के लिए “इंक्लूजन लर्निंग” (समावेशी शिक्षा) विषय पर एक ओरिएंटेशन कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम के दौरान विशेषज्ञ वक्ताओं ने शिक्षकों को समावेशी शिक्षा, छात्र विविधता, आत्म-प्रेरणा और उच्च शिक्षा में शिक्षकों की बदलती भूमिका के प्रति उपयोगी जानकारियां दीं।
कार्यक्रम में मुख्य वक्ता के रूप में विजन दिव्यांग फाउंडेशन के संस्थापक डॉ. मुकेश गुप्ता ने एक ऐसा शैक्षणिक माहौल बनाने पर जोर दिया जहां हर छात्र को, चाहे उसकी शारीरिक क्षमता, सीखने की शैली या सामाजिक पृष्ठभूमि कुछ भी हो, सीखने और आगे बढ़ने के समान अवसर मिलें। उन्होंने कहा कि समावेशी शिक्षा की शुरुआत शिक्षकों की समावेशी सोच से होती है। संकाय सदस्यों को संबोधित करते हुए डॉ. मुकेश गुप्ता ने प्रोफेसरों के बीच आत्म-प्रेरणा पर विशेष ध्यान देने की सलाह दी। उन्होंने शिक्षकों को अपने विषय के ज्ञान को लगातार अपडेट करने, नवाचार अपनाने और जीवन भर सीखते रहने के लिए प्रेरित किया गया, क्योंकि एक प्रेरित शिक्षक ही छात्रों को आत्मविश्वासी और सफल बना सकता है। डॉ. गुप्ता ने रेखांकित किया कि पढ़ाना केवल पाठ्यक्रम पूरा करने तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि इसका उद्देश्य छात्रों के ज्ञान, कौशल, मूल्यों और समग्र व्यक्तित्व का विकास करना होना चाहिए। कार्यक्रम में एक प्रभावी शिक्षक के गुणों जैसे सहानुभूति, धैर्य, ईमानदारी, समय पाबंदी, अनुकूलनशीलता और मेंटरिंग क्षमता पर चर्चा की गई। शिक्षकों से कहा गया कि वे खुद को केवल शिक्षक न मानकर मार्गदर्शक और रोल मॉडल के रूप में देखें।

कार्यक्रम की शुरुआत संस्कृति यूनिवर्सिटी की एकेडमिक्स डीन डॉ. रेनू गुप्ता के स्वागत भाषण से हुई। उन्होंने मुख्य वक्ता और सभी फैकल्टी सदस्यों का स्वागत करते हुए समकालीन उच्च शिक्षा में समावेश और संवेदनशीलता के महत्व पर प्रकाश डाला। इसके बाद स्कूल ऑफ मैनेजमेंट एंड कॉमर्स के डीन डॉ. गंगाधर हुगार ने विश्वविद्यालय की ओर से डॉ. मुकेश गुप्ता को सम्मानित किया। यह सम्मान विभिन्न क्षमताओं वाले व्यक्तियों के सशक्तिकरण और समावेश के प्रति उनके बहुमूल्य योगदान के लिए दिया गया। कार्यक्रम का समापन शिक्षकों से पूरे विश्वविद्यालय में समानता, गरिमा, सम्मान और समावेश की संस्कृति को बढ़ावा देने के आह्वान के साथ हुआ। उपस्थित प्रोफेसरों और फैकल्टी सदस्यों ने इस पहल की सराहना की और इसे उच्च शिक्षा की बदलती जरूरतों के लिए बेहद प्रासंगिक बताया।

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