ग़ज़ल
इन निगाहों में तेरी सूरत है,
तू मेरी आख़िरी मुहब्बत है।
जिससे शिकवा गिला शिकायत है,
जाने क्यों उससे ही मुहब्बत है।
सिर्फ़ तुझको,मेरे ख़यालों में,
आने और जाने की इजाज़त है।
अब तुम्हारे ख़याल से दिलबर,
मेरे अल्फ़ाज़ में नज़ाकत है।
कोई बदले भी तो भला कैसे,
ये मुहब्बत भी एक आदत है।
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शावर भकत ’भवानी’
वृन्दावन
