ग़ज़ल
जो स्वयं से प्यार करना सीख जाते हैं,
प्यार वे विस्तार करना सीख जाते हैं।
खुद को जो स्वीकार करना सीख जाते हैं,
ज़ीस्त से वे प्यार करना सीख जाते हैं।
भूलकर कर्तव्य जाने कैसे वालिद पे,
नस्ले-नौ अधिकार करना सीख जाते हैं।
आस्तीं कहती है मुझसे साँप भी अक्सर,
दोस्त-सा व्यवहार करना सीख जाते हैं।
ज़ी-हुज़ूरी नस्ल वाले पैदा होते ही,
बेसबब जयकार करना सीख जाते हैं।
सीख लेते हैं भरोसा करना खुद पे जो,
खुद को वे तैयार करना सीख जाते हैं।
चाहे युग कोई भी हो,सच बोलने वालेलेखनी को धार करना सीख जाते हैं।
लेखनी को धार करना सीख जाते हैं।
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शावर भकत ’भवानी’
वृन्दावन
